सूक्ष्य, लघु और मध्यम उद्योगों को सरकारी पेमेंट मिल जाए तो भी संभल जाएंगे


भोपाल सूक्ष्य, लघु और मध्यम (एमएसएमई) उद्योगों को फिर से खड़ा करने में जुटी सरकार के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। उद्योगपतियों का कहना है कि सरकार कह तो बहुत कुछ रही है, पर कर नहीं रही। इस कारण उद्योगों में कामकाज शुरू नहीं हो पा रहा है। सरकार के एक माह के अथक प्रयासों के बाद भी प्रदेश में 40 फीसदी उद्योगों के ही ताले खुले हैं।

उनमें भी महज पांच हजार उद्योगों में उत्पादन शुरू हो पाया है। वे कहते हैं बैंकों से लोन दिलाने और तमाम गारंटी लेने की बजाय सरकारी विभागों में फंसा पैसा ही दिला दे, तो उद्योग पटरी पर आ जाएं। विभाग में करीब पांच सौ करोड़ रुपये फंसा है। जिसका भुगतान कोरोना संक्रमण के चलते नहीं हो पा रहा। प्रदेश में 22,885 छोटे-मंझोले उद्योग हैं। इनमें से 55 फीसदी उद्योग बड़े उद्योगों पर निर्भर हैं।
इन उद्योगों में सपोर्टिंग पार्ट्स बनाए जाते हैं। मसलन बीएचईएल बड़े उपकरण बनाता है। इनके कुछ पार्ट्स गोविंदपुरा स्थित फैक्ट्रियों में तैयार होते हैं। जबकि 45 फीसदी उद्योग मेडिकल, स्टेशनरी, सैनिटाइजर, फर्श क्लीनर सहित रोजमर्रा की जरूरतों के उपकरण एवं सामान बनाते हैं। इनमें से ज्यादातर उद्योग सरकारी सप्लाई देते हैं।

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