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रामायण काल से जुड़ा है कानपुर के 'तपेश्‍वरी देवी मंदिर' का नाम

 रामायण काल से जुड़ा है कानपुर के 'तपेश्‍वरी देवी मंदिर' का नाम
रामायण काल से जुड़े कुछ स्‍थल आज भी हमें उस काल के पौराणिक महत्‍व की गाथा सुनाते हैं और उनमें से एक है कानपुर का तपेश्‍वरी मंदिर। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के उत्तर कांड में इस स्‍थान का उल्‍लेख मिलता है, जिसमें इस स्‍थान का माता सीता के वनवास काल और बिठूर प्रवास से गहरा संबंध बताया जाता है। चलिए हम आपको इस मंदिर से जुड़ी कुछ पौराणिक कथाओं और महत्‍व के बारे में बताते हैं।




यहां की थी माता सीता ने तपस्‍या?
श्री राम के त्याग और अयोध्या से निकलने के बाद देवी सीता, जब वनवास में समय बिता रही थीं, तब इस स्थान पर उन्होंने भगवान श्री राम का विश्वास पुनः वापस पाने के उद्देश्य से तपस्या की थी। यहां देवी सीता के साथ-साथ कमला, विमला और सरस्वती नाम की चार देवियों ने भी इस स्थान पर तपस्या की थी। मान्यता है कि देवी सीता माता लक्ष्मी का ही स्वरूप थीं। उनका दुख देखकर तीनों देवियों ने भी इस अधर्म को रोकने के लिए तपस्या की थी। तब से ही इस स्थान का नाम तपेश्वरी पड़ गया।

यहां पर आज भी चार पिंडियां हैं और नवरात्रि के समय यहां श्रृद्धालुओं की भीड़ रहती है।और नवरात्रि के समय यहां श्रृद्धालुओं की भीड़ रहती है। आज भी यहां लोग हवन-पूजन कराते हैं और मन्‍नत पूरी होने पर घंटियां चढ़ाते हैं।

यहीं हुआ था लव-कुश का मुंडन
इसी स्थान पर देवी सीता ने अपने दोनों बेटों लव-कुश का मुंडन और कनछेदन कराया था। तब से यह जगह इन दोनों संस्कारों के लिए बहुत प्रचलित हो गई। इस स्थान को एक तीर्थ कहा जा सकता है, क्योंकि यहां के पौराणिक महत्व को जानकर लोग दूर-दूर से यहां पर अपने बच्चों का मुंडन और कनछेदन कराने आते हैं। इतना ही नहीं, यहां पर नवविवाहित जोड़ों को देवी के दर्शन के लिए लाया जाता है। माना जाता है कि यहां पर नए जोड़ों को आशीर्वाद दिलाने से उनका दांपत्य जीवन बहुत ही सुखद और प्रभावशाली रहता है।

अतः रामायण काल से जुड़े इस स्थल को बहुत ही पवित्र माना जाता है। यहां जो आता है, मान्यता है कि उसकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है।

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