सोम डिस्टलरी लायसेंस निलंबन आदेश पर उठे सवाल,कांग्रेस ने आदेश का कमजोर करने वाला बताया
भोपाल। मध्य प्रदेश की शराब कंपनी सोम डिस्टलरी के लायसेंस निलंबन मामले में जिम्मेदार अफसरों की मंशा व आदेश अब सवालों के दायरे में है। कांग्रेस सांसद व अधिवक्ता विवेक तन्खा ने निलंबन आदेश में महाधिवक्ता की राय का जिक्र करने पर इसे केस को कमजोर करने वाला बताया है। वहीं कांग्रेस ने अदालत के आदेश पर दो साल बाद अमल पर सवाल खड़े करते हुए मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
इंदौर जिले की देपालपुर अदालत के फैसले के दो साल बाद,यानी तीन दिन पहले सोम डिस्टलरी रायसेन की दो इकाईयों का लाइसेंस निलंबित हुआ। इस मामले में नया विवाद निलंबन आदेश की भाषा पर खड़ा हो गया है। विपक्षी दल कांग्रेस ने आबकारी आयुक्त अभिजीत अग्रवाल के आदेश पर सवाल खड़े किए। वरिष्ठ अधिवक्ता व राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने आदेश में महाधिवक्ता व उनकी राय का जिक्र किए जाने पर सख्त ऐतराज जताया। सोशल मीडिया पर साझा एक पोस्ट में उन्होंने लिखा कि यह केस को कमजोर करने वाली व गलत परंपरा है।
अब कैसे पैरवी करेंगे महाधिवक्ता?
कांग्रेस सांसद ने लिखा—महाधिवक्ता संवैधानिक पद है। वही न्यायालय में सरकार की ओर से पैरवी करते हैं। ऐसे में लाइसेंस निलंबन आदेश में उनकी राय का उल्लेख होने से वह कैसे इस केस की पैरवी कर पाएंगे। तन्खा ने लिखा कि आबकारी विभाग की यह गलत परंपरा आगे केस की पैरवी को प्रभावित कर सकती है।
जांच की मांग, फाइल दबाए रखने का आरोप
इधर,कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के.के.मिश्रा ने सवाल उठाया कि अदालत के आदेश के बावजूद फाइल दो साल तक क्यों दबाई गई? उन्होंने उच्चस्तरीय जांच की मांग करते हुए कहा कि आदेश में महाधिवक्ता की राय का जिक्र कर कंपनी के बचाव के लिए कानूनी रास्ते छोड़ दिए गए।
आदेश में कार्रवाई का बताया कानून सम्मत
गत 4 फरवरी को जारी निलंबन आदेश को आबकारी आयुक्त अभिजीत अग्रवाल ने कानून सम्मत बताया। इसमें कहा गया कि मध्यप्रदेश आबकारी अधिनियम 1915 की धारा 31 के तहत लाइसेंस निलंबन की कार्रवाई वैध है। उन्होंने तर्क दिया कि हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने सजा के क्रियान्वयन पर रोक लगाई है। आरोपियों की दोषसिद्धि पर नहीं। इसी आधार पर यह कदम उठाया गया।
कोर्ट का दो साल पुराना आदेश बना आधार
दरअसल,आबकारी विभाग ने साल 2021 में सोम डिस्टलरी के कर्ताधर्ताओं को फर्जी परमिट पर शराब का अवैध परिवहन करते पकड़ा था। इस मामले में अपर सत्र न्यायालय, देपालपुर ,जिला इंदौर ने शराब कंपनी से जुड़े संचालकों, प्रतिनिधियों और कर्मचारियों को कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई। इस पर आरोपी पक्ष ने हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ से स्थगन आदेश लिया। इसी का खुलासा आबकारी आयुक्त ने अपने हाल के आदेश में किया है।
सैकड़ों की तादाद में बनाए थे फर्जी परमिट
प्रकरण में यह तथ्य भी सामने आए कि शराब कंपनी द्वारा शराब के अवैध परिवहन के लिए बड़ी संख्या में फर्जी परिवहन परमिट तैयार किए गए। इनके जरिए रायसेन से लेकर दमन,दीव तक शराब का अवैध परिवहन हुआ। परमिट जारी करने में आबकारी विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आई। इसके चलते आबकारी उपनिरीक्षक प्रीति गायकवाड़ को 25 सितंबर 2025 को बर्खास्त किया गया। अन्य के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई जारी है, जबकि कुछ सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

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