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14 फरवरी, प्रकृति और प्रेम का बाज़ारीकरण

 14 फरवरी, प्रकृति और प्रेम का बाज़ारीकरण

राष्ट्र की बात 

शीतल रॉय ✍🏻



यूं तो फरवरी  आते ही प्रकृति करवट लेती है। ऋतुएँ संकेत देने लगती हैं कि सृजन का समय निकट है। धरती के गर्भ में  नई ऊर्जा जागती है, वृक्षों की नसों में रस दौड़ता है और जीव-जगत अपने स्वाभाविक आकर्षण की ओर बढ़ता है। क्योकि यह परिवर्तन दैविक है, शाश्वत है—और किसी कैलेंडर का मोहताज नहीं।

लेकिन विडंबना यह है कि जिस समय प्रकृति प्रेम को मौन और मर्यादा में रचती है, उसी समय को आधुनिक  समाज ने  प्रेम को 14 फ़रवरी की एक तिथि में क़ैद कर दिया है। वैलेन्टाइन डे—जो कभी भावना था—आज बाज़ार की सबसे सफल रणनीति बन चुका है। लाल गुलाब, कृत्रिम मुस्कान और क्षणिक आकर्षण को प्रेम का पर्याय बना दिया गया है।

प्रकृति का प्रेम संयम सिखाता है, जबकि बाज़ार का प्रेम उपभोग।


आज की युवा पीढ़ी, जो ऊर्जा और संभावनाओं से भरी है, इस द्वंद्व की सबसे बड़ी शिकार बनती जा रही है। हार्मोनल बदलाव, मौसम की नरमी और भावनात्मक अस्थिरता इन सबका लाभ उठाकर एक कृत्रिम प्रेम संस्कृति गढ़ी जा रही है, जहाँ संबंध गहराई से नहीं, प्रदर्शन से मापे जाते हैं।

दैविक प्रकृति तो प्रेम को साधना मानती है। हमारे शास्त्रों में प्रेम  तो तप, त्याग और उत्तरदायित्व से जुड़ा है। शिव-शक्ति, राधा-कृष्ण या सीता-राम—कहीं भी प्रेम उपभोग नहीं, समर्पण है। वहीं आधुनिक वैलेन्टाइन संस्कृति प्रेम को क्षणिक उत्तेजना में बदल देती है, जहाँ न स्थायित्व है, न मर्यादा।

यही कारण है कि फरवरी आते-आते रिश्ते पनपते कम, टूटते अधिक हैं। जो संबंध आत्मिक नहीं होते, वे इस मौसम की सच्चाई सह नहीं पाते। प्रकृति आईना दिखाती है और बाज़ार उस आईने पर रंगीन पर्दा डाल देता है।


यह लेख आज की युवा पीढ़ी को काल्पनिक लग सकता है  लेकिन एक पत्रकार- लेखक होने के नाते मेरा दायित्व है कि  प्रेम के इस बाज़ारी चेहरे पर प्रश्न खड़े करू। क्या युवा पीढ़ी को केवल उपभोक्ता बनाना ही विकास है? क्या भावनाओं को भी सेल और ऑफ़र में तौला जाएगा?

संपादकीय दृष्टि से यह समय आत्ममंथन का है। युवाओं को यह समझना होगा कि प्रेम प्रकृति से सीखने की प्रक्रिया है, न कि विज्ञापनों से। प्रेम समय मांगता है, धैर्य मांगता है और उत्तरदायित्व मांगता है।


फरवरी हमें यह संदेश देती है कि जो दैविक है, वह शोर नहीं करता। वह चुपचाप जीवन रचता है।

और जो कृत्रिम है, वह एक दिन के उत्सव में खत्म हो जाता है। वक्त है बदलाव का अब युवा पीढ़ी को तय करना है की किताबों के पन्नो में दबकर सूखने वाले उन्हें गुलाब चाहिए या मन के आंगन में खिलने वालीं गुलाब की जड़ें।

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