अविमुक्तेश्वरानंद को मिले नोटिस पर सियासी बवाल
प्रयागराज के माघ मेले में ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान से रोके जाने के बाद विवाद तेज हो गया है। मेला प्रशासन ने उन्हें नोटिस जारी कर उनके 'शंकराचार्य' पद की वैधता पर सवाल उठाए हैं। नोटिस में पूछा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद वे खुद को ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य कैसे प्रचारित कर रहे हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इस पर कड़ा विरोध जताया और धरना जारी रखा है, जिसमें वे माफी की मांग कर रहे हैं।
कांग्रेस ने बीजेपी पर साधा निशाना, मुसलमानों से तुलना
कांग्रेस ने इस घटना को बीजेपी सरकार की अहंकारपूर्ण कार्रवाई करार दिया। पार्टी के मीडिया प्रमुख पवन खेड़ा ने तीखा हमला बोला, 'पहले मुसलमानों से 'कागज दिखाओ' कहा जाता था, अब शंकराचार्य से भी कागज मांगे जा रहे हैं।' उन्होंने कहा कि गुरु-शिष्य परंपरा से शंकराचार्य चुने जाते हैं, सरकार की कोई हैसियत नहीं कि यह तय करे। खेड़ा ने कटाक्ष किया, 'जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके सामने नतमस्तक हुए, गौ मांस पर सवाल नहीं उठाए गए, आधे-अधूरे मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का विरोध नहीं किया गया, तब वे शंकराचार्य थे। लेकिन अब नतमस्तक न होने की सजा मिल रही है।'
नोटिस का आधार: सुप्रीम कोर्ट का पुराना आदेश
मेला प्रशासन के नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के 2022 के आदेश का हवाला दिया गया है, जिसमें ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य पद पर लंबित अपील के दौरान किसी नए पट्टाभिषेक पर रोक लगाई गई थी। नोटिस में कहा गया कि कोई धर्माचार्य पट्टाभिषेकित नहीं किया गया, फिर भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शिविर में बोर्ड लगाकर खुद को शंकराचार्य बता रहे हैं। उन्हें 24 घंटे में स्पष्टीकरण देने को कहा गया है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जवाब और धरना
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि न तो मुख्यमंत्री और न ही राष्ट्रपति तय कर सकते हैं कि शंकराचार्य कौन है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई उनकी सरकार की आलोचना (जैसे कोविड में गंगा में शव, कुंभ प्रबंधन आदि) के कारण है। वे बिना स्नान किए लौट आए और धरना पर बैठे हैं, जिसमें वे माफी मांगने तक नहीं हटेंगे।

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