मंत्रालय में भटक रही मंत्री विजय शाह केस की फाइल,फैसले में अब 48 घंटे बकाया
भोपाल। मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह केस को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के बाद राज्य सरकार पसोपेश में है। शाह के खिलाफ दर्ज केस को अभियोजन की मंजूरी के लिए सिर्फ 48 घंटे की मियाद है। इसके चलते शाह से जुड़ी नस्ती मंत्रालय में एक से दूसरे विभाग में भटक रही है।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने गत 20 जनवरी को अपने एक फैसले में राज्य सरकार को इस मामले में दो सप्ताह में निर्णय लेने की मोहलत दी है। इसकी मियाद आगामी दो फरवरी सोमवार को पूरी होगी। सरकार अब तक शाह केस में किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है। सूत्रों का दावा है कि इस मामले में उसे केंद्र के इशारे का इंतजार है।
एक से दूसरे विभाग में भटक रही है नस्ती
सूत्रों के मुताबिक,सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शाह केस की नस्ती होम से जीएडी और जीएडी से होम के बीच भटक रही है। सूत्रों का दावा है कि फैसला गृह विभाग को लेना है,लेकिन शासन स्तर से अब तक कोई दिशा—निर्देश नहीं मिलने के चलते जिम्मेदार अफसर इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं।
केंद्र के इशारे का इंतजार
जानकारों की मानें तो शाह केस में सरकार के पास तीन विकल्प हैं। पहला वह सुप्रीम कोर्ट में फैसले के रिवीजन को लेकर याचिका दायर करे। दूसरा अभियोजन की अनुमति दे दी जाए और तीसरा इससे इंकार कर दे। बताया जाता है कि शासन को भी इस मामले में केंद्र के इशारे का इंतजार है। इसके बाद ही किसी एक विकल्प पर वह निर्णय लेगी।
इसके चलते मंत्रालय ने रिवीजन अपील का मसौदा भी तैयार रखा है,ताकि ऐन वक्त पर इसे दायर करने में देर न हो।
अपील से कुछ दिनों की राहत
सूत्रों के अनुसार,सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर रिवीजन अपील से सरकार को कुछ दिन की राहत भले ही मिले,लेकिन इस प्रकरण में जिस तरह से अब तक न्यायालय का रुख सामने आया है,उसे देखते हुए सरकार को राहत की बहुत अधिक उम्मीद नहीं है। यह प्रयास मंत्री विजय शाह ने भी किया और उन्हीं की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को दो सप्ताह में फैसला लेने का आदेश दिया।
इधर खाई,उधर कुंए जैसे बने हालात
दूसरे विकल्प के तौर पर राज्य सरकार यदि अभियोजन की मंजूरी देती है तो वह शाह का मंत्री पद बचाने में भले ही सफल रहे,लेकिन उसका फैसला यह साबित करेगा कि उसने शाह पर लगे आरोप को सही माना है। ऐसे में विपक्ष नैतिकता का हवाला देकर सरकार पर शाह को मंत्री पद से हटाने के लिए दबाव बना सकता है। इससे सरकार को सियासी नुकसान होगा। तीसरा विकल्प अपनाने पर सुप्रीम कोर्ट कड़ा रुख अपनाते हुए अपना कोई फैसला सुना सकता है। इसके बाद,शाह को मंत्रिमंडल से हटाना सरकार की मजबूरी बन सकता है।
यह है मामला
मंत्री विजय शाह ने आपरेशन सिंदूर में शामिल कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर महू में विवादित टिप्पणी की थी। इस पर हाईकोर्ट जबलपुर ने संज्ञान लेते हुए उनके खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने के आदेश दिए थे। कोर्ट के आदेश पर इंदौर पुलिस ने उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया। विजय शाह राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। सुप्रीम कोर्ट ने जांच पर रोक से मना किया, लेकिन इसका जिम्मा 3 आईपीएस अधिकारियों की एसआईटी को सौंप दिया। कोर्ट के आदेश पर आईपीएस प्रमोद वर्मा, कल्याण चक्रवर्ती और वाहिनी सिंह की 3 सदस्यीय एसआईटी का गठन हुआ। कोर्ट ने एसआईटी को 13 अगस्त तक जांच पूरी करने को कहा था।
एसआईटी ने बताया,हमने अभियोजन की अनुमति मांगी
गत 19 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में हुई सुनवाई हुई। एसआईटी ने बताया कि उसने 19 अगस्त को सरकार से मुकदमे की अनुमति मांगी थी। बीएनएस की धारा 196 (सांप्रदायिक या दूसरे आधारों पर समाज मे वैमनस्य फैलाना) के मामलों में यह अनुमति आवश्यक है, लेकिन अभी तक उसे सरकार से कोई सूचना नहीं मिली है। बेंच ने इस पर असंतोष जताया। कोर्ट ने यह भी कहा कि एसआईटी की रिपोर्ट में विजय शाह के दूसरे आपत्तिजनक बयानों का भी उल्लेख किया गया है। ऐसे मामलों में प्रस्तावित कार्रवाई को लेकर भी एसआईटी एक अलग रिपोर्ट दाखिल करे।
मंजूर नहीं हुई शाह की माफी
सुनवाई में शाह की ओर से वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह पेश हुए। उन्होंने कहा कि शाह ने माफी मांग ली है और जांच में सहयोग कर रहे हैं। इस पर बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड पर कोई औपचारिक माफी उपलब्ध नहीं है। चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि अब माफी मांगने में बहुत देर हो चुकी है। इससे पहले भी कोर्ट शाह की सार्वजनिक माफी को कानूनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास बताते हुए खारिज कर चुका है। पिछले साल जुलाई में हुई सुनवाई में कोर्ट ने मंत्री की तरफ से मांग गई ऑनलाइन माफी पर भी कड़ी नाराजगी जताई थी।

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