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चंबल अंचल के मुरैना में दुर्गम पहाड़ और जंगलों के बीच बना है 9वीं सदी का शिवधाम

 मुरैना। ग्वाल‍ियर चंबल अंचल स्थित मुरैना मेें बटेश्वरा के 200 मंदिरों के समूह से भी कई सदी पुराना शिव धाम भी बसा है। 9वीं सदी की इस प्राचीन मंदिर श्रंखला में दुर्गम रास्ते, घने जंगल व पहाड़ों के बीच लगभग 45 मंदिर हैं, जिनमें से आधे मंदिर पत्थरों का ढेर बनकर पहाड़-जंगलों में बिखरे हैं। यहां मंदिर वर्गाकार बने हैं, जो देश में कहीं और नहीं दिखते। मंदिर में अलग-अलग आकार के शिवलिंग है। मुख्य मंदिर का शिवलिंग चतुर्भुजी हैं, जिसका जलाभिषेक पहाड़ों को चीरकर निकली जलधारा करती है।



जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर, मुरैना, ग्वालियर और भिंड जिले की सीमा के बीच दुर्गम जंगल और पहाड़ांे के बीच नरेश्वर महादेव को स्थानीय लोग केदारा के नाम से भी जानते हैं, क्योंकि शिव मंदिरों के बीच माता हरसिद्धि का मंदिर भी है। यहां 23 मंदिर 16-17 सदी पुराने हैं, 20 से अधिक मंदिर डेढ़ वर्ग किलोमीटर एरिया में पत्थर बनकर बिखरे हैं।

मंदिरों के बीच पहाड़ काटकर बनाए गए गर्भगृह में स्थित है, नरेश्वर महादेव का शिवलिंग चौकोर हैं। ऐसा चौकोर शिवलिंग नरेश्वर के अलावा भोपाल के भोजपुर मंदिर में देखने को मिलता है, लेकिन नरेश्वर के कई मंदिरों में चौकोर, कई में अंडे जैसे आकार के, कई पिंडी व मणि के आकार के शिवलिंग हैं। हर मंदिर में समानता यह है कि अधिकांश शिवलिंग नींचे से चौकोर हैं। राज्य पुरातत्व धरोहरों में शामिल मंदिरोें के संरक्षण का काम पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग के पुरातत्वविद हुकुम चंद की निगरानी मंे 9 माह से चल रहा है।

बटेश्वरा से तीन सदी पुराना, समानताएं कईं

मुरैना का बटेश्वरा मंदिर समूह पूरी दुनिया में ख्याति पा चुका है,नरेश्वर मंदिर समूह, बटेश्वरा के मंदिरों से लगभग तीन सदी पुराना है। जिला पुरातत्व अधिकारी अशोक शर्मा बताते हैं, कि बटेश्वरा मंदिर समूह 8 से 10वीं सदी गुर्जर-प्रतिहार राजवंश में बने और 13वीं सदी में नष्ट हो गए थे। वहीं नरेश्वर मंदिर समूहों का निर्माण गुप्तकाल यानी तीसरी से पांचवी सदी के बीच हुआ है और इनका विस्तार 8 से 9वीं सदी के बीच हुआ। बटेश्वरा में अभी भी 140 मंदिर भग्नावस्था में हैं, तो नरेश्वर में भी 20 से ज्यादा मंदिरों के अवशेष डेढ़ वर्गकिलोमीटर के एरिया में पत्थरों की तरह बिखरे पड़े हैं।

पानी निकासी और जलसंरक्षण का अद्भुत प्रबंधन

पहाड़ों को काटकर बनाए गए नरेश्वर मंदिरों के पीछे, पहाड़ी की चोटियों पर दो तालाब हैं, जो बारिश में लबालब होने के बाद पानी पहाड़ों को चीरकर नरेश्वर शिवलिंग और उसके पास बने मंदिर के शिवलिंग के ऊपर ऐसे टपकता है, जिससे प्राकृतिक रूप से शिवलिंग का जलाअभिषेक होता है।

पुरातत्व अधिकारी अशोक शर्मा बताते हैं कि नरेश्वर जैसे वर्गाकार मंदिर देश में कहीं नहीं मिलते। आदिकाल में यहां पहुंचने के लिए जलमार्ग हुआ करता था, क्योंकि चारों ओर पानी भरा था। मंदिर के ऊपर, पास होकर और अंडर ग्राउंड तरीके से जलनिकासी प जलसंरक्षण का ऐसा प्रबंध किया गया है, जो आधुनिक इंजीनियरों को भी अचरज मेें डाल देता है। बारिश मेें मंदिरों के बीच से पानी बहने से आवागमन के लिए पत्थरों का पुल बना है। 

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