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दिग्विजय कांग्रेस का इकलौता चेहरा, जिसके खिलाफ शिवराज सरकार तल्ख और भाजपा मुखर

भोपाल। सियासत में कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं, जो अपनी पार्टी से ज्यादा विपक्ष के लिए मुफीद बन जाते हैं। मध्य प्रदेश की सियासत में ऐसा ही चेहरा दिग्विजय सिंह बन चुके हैं, जो कांग्रेस से ज्यादा भाजपा के लिए कारगर माने जा रहे हैं। अब तो कांग्रेस में एकमात्र वही ऐसे नेता बन गए हैं, जिनके खिलाफ हमेशा शिवराज सरकार की तल्खी बनी रहती है और भाजपा भी मुखर रहती है। शिवराज सरकार पर पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ भी हमलावर रहते हैं, लेकिन अघोषित तौर पर सत्ता-संगठन उन्हें कड़ी प्रतिक्रिया नहीं करता। ताजा मामला सीएम हाउस के बाहर डूब प्रभावितों के हक के लिए दिग्विजय सिंह द्वारा धरना देने का है।


दिग्विजय के विरोध की पांच वजह

चुनाव नगर निकाय से लेकर विधानसभा या लोकसभा का क्यों न हो, दिग्विजय के कार्यकाल को भाजपा याद न दिलाए, ऐसा हो नहीं सकता है। दरअसल वर्ष 2003 से दिग्विजय सिंह सत्ता से बाहर हैं। 2018 में कमल नाथ कांग्रेस सरकार के मुखिया बने फिर भी भाजपा के लिए चुनौती सिर्फ दिग्विजय ही रहते हैं। इसकी पांच बड़ी वजहें सामने आती हैं, जो कमल नाथ के मुकाबले दिग्विजय सिंह को विरोध के लिए अधिक फायदेमंद साबित करती हैं।

1- सिंह की असफल मुख्यमंत्री की छवि गढ़ने में भाजपा की सफलता। भाजपा ने चुनावी अभियानों के साथ ही सियासत के हर छोटे-बड़े घटनाक्रम में दिग्विजय सिंह को कांग्रेस की विफल सरकार का चेहरा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। भाजपा, विशेषकर मुख्यमंत्री कांग्रेस की असफलता के लिए कमल नाथ के बजाय अब भी दिग्विजय सिंह की सरकार की याद दिलाते हैं।

2- दिग्विजय का हिंदुत्व विरोधी

जिससे भाजपा को सियासत में हमेशा फायदा मिलता रहा है। सिंह की इसी छवि के चलते उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में भोपाल सीट से हार का सामना करना पड़ा था। सिंह के बयानों के आधार पर भाजपा कई बार चुनावों का धार्मिक ध्रुवीकरण करने में सफल रही है। ऐसा लाभ भाजपा को मध्य प्रदेश से बाहर दूसरे राज्यों में भी मिल चुका है। इस मामले में सॉफ्ट हिंदुत्व के चलते कमल नाथ भाजपा के निशाने पर नहीं आते।

3- दिग्विजय सिंह को राजा कहे जाने से उनके लिए गढ़ी गई गरीब विरोधी छवि। उन पर कांग्रेस में ही आदिवासी, दलित, पिछड़ेे और कमजोर वर्ग के नेताओं को अहम जिम्मेदारी से दूर रखने के आरोप लगते रहे हैं। जबकि कमल नाथ ने अपनी सरकार और संगठन में जातिगत संतुलन साधने की कोशिश की थी, जिसके चलते वह भाजपा के निशाने पर आने से बचते रहे हैं।

4-एक बड़ी वजह संगठन स्तर पर मिलने वाला लाभ। दिग्विजय के पूरे मध्य प्रदेश में समर्थक हैं। उनका विरोध करने पर पूरे प्रदेश से प्रतिक्रिया होती है, जिससे स्थानीय स्तर पर भी भाजपा के पदाधिकारी और कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं। उन्हें राष्ट्रीय स्तर के नेता के विरोध का मौका मिल जाता है। कमल नाथ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं, लेकिन प्रदेश में उनके उतने समर्थक नहीं हैं, जितने की दिग्विजय सिंह के।

5- दिग्विजय के राष्ट्रीय स्तर के सियासी कद का फायदा भी भाजपा को मिलता है। उनके विवादित बयान और उस पर कांग्रेस हाईकमान की चुप्पी साबित करती रही है कि वह किसी की परवाह नहीं करते। ऐसे में भाजपा जब दिग्विजय को घेरती है, तो न सिर्फ मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आता है, बल्कि हाईकमान को ही सीधे चुनौती देने का मौका मिल जाता है। जबकि कमल नाथ के साथ ऐसा नहीं है। वह विवादित बयानों से तो बचते ही हैं, साथ ही दिल्ली के संपर्क में रहते हैं। कोई विवादित स्थिति बन जाने पर पार्टी को साथ लेकर चलते हैं।

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