तीन तलाक का मुद्दा 34 साल में दो बार संसद पहुंचा, नए कानून के तहत यह प्रथा होगी अपराध



नई दिल्ली/  पहले 1985 और अब 2019 , 34 साल में दो मौके ऐसे आए, जब तीन तलाक का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में जाने के बाद संसद तक पहुंचा और इस पर कानून बना। 1985 में शाहबानो थीं, जिन्हें हक दिलाने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद के जरिए कानून बनाकर पलट दिया गया था। वहीं, इस बार संसद ने ऐसा विधेयक पारित किया है, जिससे तीन तलाक अपराध की श्रेणी में आ जाएगा। यह विधेयक शायरा बानो जैसी महिलाओं के लिए याद रखा जाएगा।  चालीस साल की शायरा बानो ने तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। शायरा को उनके पति ने टेलीग्राम से तलाकनामा भेजा था। शायरा की याचिका पर ही अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाकर तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया था।
यह विधेयक कौन-सा है?
यह मुस्लिम महिला (विवाह से जुड़े अधिकारों का संरक्षण) विधेयक है। कानून बन जाने के बाद यह तलाक-ए-बिद्दत यानी एक ही बार में तीन बार तलाक कह देने के मामलों पर लागू होगा।
इसका क्या असर होगा?
तीन तलाक से जुड़े मामले नए कानून के दायरे में आएंगे। वॉट्सऐप, एसएमएस के जरिए तीन तलाक देने से जुड़े मामले भी इस कानून के तहत ही सुने जाएंगे। तीन तलाक की पीड़िता को अपने और नाबालिग बच्चों के लिए गुजारा-भत्ता मांगने का हक मिलेगा।  तीन तलाक गैर-जमानती अपराध होगा। यानी आरोपी को पुलिस स्टेशन से जमानत नहीं मिलेगी। पीडि़त पत्नी का पक्ष सुनने के बाद वाजिब वजहों के आधार पर मजिस्ट्रेट ही जमानत दे सकेंगे। उन्हें पति-पत्नी के बीच सुलह कराकर शादी बरकरार रखने का भी अधिकार होगा। मुकदमे का फैसला होने तक बच्चा मां के संरक्षण में ही रहेगा। आरोपी को उसका भी गुजारा-भत्ता देना होगा।  तीन तलाक का अपराध सिर्फ तभी संज्ञेय होगा, जब पीडि़त पत्नी या उसके परिवार (मायके या ससुराल) के सदस्य एफ आईआर दर्ज कराएं। तीन तलाक देने के दोषी पुरुष को तीन साल की सजा देने का प्रावधान है।
इसके फ ायदे क्या हैं?
सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान मामलों के जानकारों के अनुसार, तीन तलाक विधेयक का पास होना तीन वजहों से बड़ा फैसला है। पहला- मुस्लिम पर्सनल लॉ में संसद के जरिए बदलाव किया गया है। दूसरा- इसे समान नागरिक संहिता की शुरुआत माना जा सकता है। तीसरा- यह महिलाओं के सम्मान की दिशा में उठाया गया कदम है। इससे मुस्लिम महिलाओं का उत्पीडऩ रुकेगा। उन्हें मध्यकालीन प्रथा से आजादी मिलेगी। कई इस्लामिक देशों में तीन तलाक पर पहले ही प्रतिबंध लगाया जा चुका है और अब भारत में भी इस पर प्रतिबंध लगाने से मुस्लिम महिलाओं को फ ायदा होगा। सरकार ने तीन तलाक विधेयक के जरिए शादी जैसे मामले को सिविल लॉ से क्रिमिनल ऑफेंस में बदल दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने किस तलाक को असंवैधानिक बताया था?
तलाक-ए-बिद्दत यानी एक ही बार में तीन बार तलाक कह देना। यह हनफ ी पंथ को मानने वाले सुन्नी मुस्लिमों के पर्सनल लॉ का हिस्सा है। इसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहराया था। अब संसद से पारित विधेयक के कानून बन जाने पर वॉट्सएप, ईमेल, एसएमएस, फ ोन, चि_ी जैसे अजीब तरीकों से तलाक देने पर रोक लगेगी। कई मामले ऐसे भी आए, जिसमें पति ने वॉट्सऐप या मैसेज भेजकर पत्नी को तीन तलाक दे दिया। प्रथा के मुताबिक, ऐसे मामलों में अगर किसी पुरुष को लगता था कि उसने जल्दबाजी में तीन तलाक दिया है, तब भी तलाक को पलटा नहीं जा सकता था। तलाकशुदा जोड़ा फि र हलाला के बाद ही शादी कर सकता था। तीन तलाक के बाद पहले शौहर के पास लौटने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया निकाह हलाला कहलाती है। इसके तहत महिला को अपने पहले पति के पास लौटने से पहले किसी और से शादी करनी होती है और उसे तलाक देना होता है। अलग होने के वक्त को इद्दत कहते हैं।
1985 में इंदौर निवासी  शाहबानो का मामला रहा सुर्खियों में
इंदौर की रहने वाली शाहबानो 62 साल की थीं, जब उनके तीन तलाक का मामला सुर्खियों में आया। शाहबानो के 5 बच्चे थे। उनके पति ने 1978 में उन्हें तलाक दिया था। पति से गुजारा भत्ता पाने का मामला 1981 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। पति का कहना था कि वह शाहबानो को गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में सीआरपीसी की धारा-125 पर फैसला दिया। यह धारा तलाक के केस में गुजारा भत्ता तय करने से जुड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो को बढ़ा हुआ गुजारा भत्ता देने के मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। जब देश में इसका विरोध हुआ तो उस वक्त की राजीव गांधी सरकार ने 1986 में एक कानून बनाया। यह कानून द मुस्लिम वुमन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स एक्ट 1986 कहलाया। इसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को डाइल्यूट कर दिया। कानून के तहत महिलाओं को सिर्फ इद्दत (सेपरेशन के वक्त) के दौरान ही गुजारा भत्ता मांगने की इजाजत मिली। राजीव गांधी सरकार के इस फैसले के खिलाफ तत्कालीन गृह राज्य मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने इस्तीफ ा दे दिया था।
2016  में  शायरा बानो प्रकरण भी हुआ चर्चित
फ रवरी 2016 में उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो (38) पहली महिला बनीं, जिन्होंने तीन तलाक, बहुविवाह  और निकाह हलाला पर बैन लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। शायरा की शादी 2002 में इलाहाबाद के एक प्रॉपर्टी डीलर से हुई थी। शायरा का आरोप था कि शादी के बाद उन्हें हर दिन पीटा जाता था। पति हर दिन छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करता था। पति ने उन्हें टेलीग्राम के जरिए तलाकनामा भेजा। वे एक मुफ्ती के पास गईं तो उन्होंने कहा कि टेलीग्राम से भेजा गया तलाक जायज है। शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में निकाह हलाला के रिवाज को भी चुनौती दी। इसके तहत मुस्लिम महिलाओं को अपने पहले पति के साथ रहने के लिए दूसरे शख्स से दोबारा शादी करनी होती है। 

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